अगर ये सब खिला दिया बच्चों को होगा दिमाग तेज और बढ़ेगी लम्बाई! आइये जानते है क्या पोषण हैं बच्चों का?
अगर ये सब खिला दिया बच्चों को होगा दिमाग तेज और बढ़ेगी लम्बाई! आइये जानते है क्या पोषण हैं बच्चों का?
आइये जानते हैं बच्चों के पोषण के बारे में कितना बच्चों को आहार मिलने से बनते है ताकतवर
आहार का महत्त्व
शरीर के पोषण एवं स्वास्थ्य-रक्षाणार्थ आहार एक प्रमुख घटक है । आहार से ही शरीर की समस्त धातुओं का पोषण होता है । यदि उचित पोषण प्राप्त न हो तो फक्करोग, बालशोष, पारिगर्भिक, कृशता एवं विभिन्न धातुओं के क्षय जनित रोग उत्पन्न हो जाते हैं । आहार की अधिक मात्रा का सेवन स्थूलता, प्रमेह, हृदय रोग आदि उत्पन्न करते हैं। दूषित आहार से उदरशूल, कृमिरोग, बालातिसार आदि व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं।
स्वस्थ रहने के लिए आहार के सन्दर्भ में अनेक नियम एवं उपनियम आयुर्वेद मनीषियों ने बताये हैं । यहाँ पर बच्चों के सन्दर्भ में कुछ नियमों का संकलन दिया जा रहा है, यथा-
• मन्त्र से अभिमन्त्रित कर पहले बालक को मधु एवं घृत चटायें। फिर इसी विधि से सर्वप्रथम बालक को दक्षिण स्तन से दूध पिलायें ।
(च.शा. 8:46)
• भोजन के आधार पर बालक को तीन वर्गों में बाँटा गया है- एक वर्ष तक की वय का बालक क्षीरप, दूसरे वर्ष तक वय का बालक क्षीरान्नाद, तदुपरान्त अन्नाद कहलाता है । अर्थात् इस वय में इस प्रकार का मुख्य भोजन है ।
(सु.सू. 35/29)
• फलप्राशन संस्कार की वय 6 माह है । इसमें क्या-क्या आहारोपयोगी है। इसका विवेचन आचार्य काश्यप ने किया है।
(का.खि. 12:15-16)
• अन्नप्राशन संस्कार की वय 10 माह है । पुनः यहाँ आहार का वर्णन शिशु की दृष्टि से दिया गया है ।
(का.खि. 12:17-18)
• माता के स्तन्य के अभाव में धात्री अथवा गोदुग्ध या अजादुग्ध का प्रयोग करना चाहिए ।
(सु.शा. 10:48; अ.हृ.उ. 1:20)
• दूध के महत्त्व को आचार्य चरक ने 'क्षीरं जीवनीयानां' कहा है। (च.सू. 25:40)
• यदि मधुरादि द्रव्यों से विपरीत आहार (द्रव्य) बालक को सात्म्य हो गया है तो वह अहितकर होने से असात्म्य कहा जायेगा । इसका क्रमशः त्याग करते हुए सात्म्य द्रव्यों का सेवन करायें । (च.शा. 8/65)
• शिशु का भोजन (आहार) स्निग्ध, शीतल, मधुर तथा दाह न उत्पन्न करने वाला होना चाहिए । (का.सूत्र. 27:66)
इस प्रकार के अनेकानेक सूत्र आयुर्वेद ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं । शैशवीय अवस्था में दुग्धाहार के पश्चात् अन्न, फल एवं सब्जियाँ मुख्य भोजन है, जिसका वर्गीकरण आयुर्वेद मनीषियों ने किया है।
आहार के मुख्य घटक
आधुनिक मतानुसार प्राणी चाहे जो भी भोज्य पदार्थ जिस रूप में ग्रहण करता हो किन्तु शरीर के अन्तर्गत रासायनिक प्रक्रियाओं के द्वारा मुख्य रूप से 5 भागों में बँट जाता है और वही स्वरूप शरीर के काम आता है-
• शर्करा (Carbohydrate)।
• प्रोभूजन (Protein)
• वसा (Fats) ।
• जल ।
• खनिज एवं जीवतिक्तिय (Minerals and Vitamins)।
जगत् के सम्पूर्ण भोज्य पदार्थों का इन्हीं 5 भागों में विभाजन किया जाता है और शरीर के लिए प्रत्येक व्यक्ति या प्राणी को कितना आवश्यक है, इसका एक निश्चित मापदण्ड तैयार किया जाता है। इस प्रक्रिया को ही पोषण (Nutrition) कहते हैं ।
प्राचीन चिकित्साशास्त्रज्ञों ने आहार, आहारविधि, पथ्य एवं अपथ्य
के रूप में इसका विशद विवेचन किया है और यथासम्भव कितने सन्तुलित आहार की आवश्यकता है इसको भी बताने का यत्न किया है। आधुनिक वर्गीकरण और आवश्यकतानुरूप इसके उपयोग का विवेचन भी आयुर्वेद ग्रन्थों में शब्द भेद से उपलब्ध है। अतः विषय के गाम्भीर्य को समझने के लिए सर्वप्रथम आधुनिक प्रचलित आहार के विषय में विस्तृत वर्णन आवश्यक है।
उपर्युक्त 5 भोजन तत्त्व शरीर में विभिन्न प्रतिशत में होते हैं । जल 63%, प्रोभूजन 17%, वसा 12%, शर्करा 1 प्रतिशत एवं खनिज तथा जीवतिक्तिय 7 प्रतिशत । शरीर को प्रत्येक कार्य के लिए शक्ति की आवश्यकता होती है । जो उसे प्रोभूजन, शर्करा एवं वसा से प्राप्त होती है । अतः 'शक्ति' की आवश्यकतानुरूप भोजन के मानक Calories के रूप में प्राप्त ऊर्जा का भी ज्ञान होना आवश्यक है ।
जल Water
जीवन के लिए वायु के बाद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व जल है । यदि वायु के बिना जीवन मात्र कुछ क्षण चलता है तो जल के बिना कुछ दिन का ही मेहमान रह जाता है। युवा से शिशु में जलीयांश की मात्रा अधिक होती है (युवा 60 से 65 प्रतिशत, शिशु 70 से 75 प्रतिशत) । शरीर के इस 70 प्रतिशत जल में-5 प्रतिशत रक्तरस (Plasma), 15 प्रतिशत कोशिकाबाह्य द्रव (Interstitial fluid) एवं 50% कोशिकामध्य द्रव (Intra- (cellular fluid) होता है । जल की आवश्यकता Caloric (शक्ति) उपयोग एवं मूत्र के आपेक्षिक घनत्व पर आधारित होती है । प्रायः प्रतिदिन जल की आवश्यकता एक स्वस्थ शिशु को 10 से 15 प्रतिशत शरीर-भार के अनुरूप होती है । जबकि युवा में शरीर-भार का 2 से 4 प्रतिशत ही जल आवश्यक होता है । बच्चों का भोजन भी इसी कारण अधिक जलीयांश वाला होता है ।
शक्ति या कैलोरी Calories
शरीर के चयापचय (Metabolism) में प्रयुक्त उष्मा की ईकाई Large Calorie (Cal) या Kilocalorie (Kcal) कहलाती है । सामान्य रूप से 1 Cal = 1 Kcal होता है । एक किलो कैलोरी का तात्पर्य है कि 1 किलोग्राम जल का तापक्रम 14.5 से 15.5 डिग्री सेण्टीग्रेड बढ़ा देने की क्षमता ।
विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न वय में शिशु द्वारा इच्छित ऊर्जा या शक्ति अलग-अलग होती है । सामान्य रूप से व्यय होने वाली शक्ति या ऊर्जा 6 से 12 वर्ष के वय के लिए निम्न रूप में होती है- आधार चयापचय (Basal Metabolism) हेतु 50 प्रतिशत, भोजन को विशिष्ट स्वरूप तक लाने के लिए (Specific dynamic action of food) 5%, विकास (Growth) हेतु 12 प्रतिशत, शारीरिक क्रियाशीलता (Physical activity) हेतु 25 प्रतिशत एवं मल से ऊर्जानाश विशेष रूप से अवशेष वसा के रूप में 8 प्रतिशत ।
हमारे भोजन से आवश्यकतानुरूप प्राप्त कैलोरी प्रायः निम्न रूप से प्राप्त होती है । शर्करा से 50 प्रतिशत, वसा से 35 प्रतिशत एवं प्रोभूजन से 15 प्रतिशत कैलोरी प्राप्त होती है । 1 ग्राम प्रोटीन से एवं शर्करा से 4 कैलोरी तथा 1 ग्राम वसा से 9 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है । नित्यप्रति आवश्यकता से अधिक या कम लेते हैं


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