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बिल्व - Latin name, family, निरुक्ति, दोषकर्म, उपयोग,प्रयोज्य अंग वानस्पतिक वर्णन

 🌿🌿बिल्व~~

बिल्व -  Latin name, family, निरुक्ति, दोषकर्म, उपयोग,प्रयोज्य अंग वानस्पतिक वर्णन


Latin name- Aegle marmelos
फैमिली -  Rutaceae
English-  Bael tree
पर्याय-शाण्डिल्य, शैलूष, मालूर, श्रीफल, हृद्यगन्ध, सदाफल, पूतिमास्त,महाकपित्व, मंथिल l



निरुक्ति-
(1) बिल्व- जो वायु और कफ को तोड़ता है।
(2) मालूर-अपने गुणों की लक्ष्मी से जो दूसरों के दुर्दुणों को तोड़ता है।
(3) श्रीफल - जिसका फल प्रिय कल्याणकारक होता है।
(4) सदाफल-जिसमें नियमित फल लगते हैं।
(5) शाण्डिल्य - जो कामादि शत्रु का नाशक है।

वानस्पतिक वर्णन- इसका मध्यमाकार 30-40 फुट ऊँचा वृक्ष होता है।

रसपंचक-(अपक्त फल)
रस - कषाय, तिक्त
गुण - लघु,रूक्षं
वीर्य - उष्ण
विपाक-  कटु

दोषकर्म - वातफहर, पितकर
अपक्व बिल्वफल - ग्राही, दीपन, आं को बल प्रदान करनेवाला
पक्व बिल्वफल - मधुर, सुगंधि, गुरु, विदाही, विष्टंभ, आनुलोमक |
बिल्वमूल - वातनाडीसंस्थान में शामक l

उपयोग-

ग्राही - दीपन, पाचन कर्म एवं उष्णता से द्रवमल का शोषण होता है। कषाय रस से स्रोतोमुख का संकोच होता है।
दीपन, पाचन - तिक्त एवम कटु रस से कफशामक एवम अग्नि प्रदीपक है l
अतिसार प्रवाहिका - दीपन, पाचन एवं ग्राही कर्म से विख्य अतिसार और प्रवाहिका में उपयोगी है।
प्रमेह - बिल्वपत्रस्वरस मधु के साथ मधुमेह में उपयोगी है।आमयिक प्रयोग-
(1) बिमूल के सुखोष्ण क्वाय में अशोरोगी को बिठाने से शूल कम होता है।
(2) स्कन्ध नामक बहुप्रतिषेधार्य बालक के गले में बिल्कण्टक की माला बनाकर पहनाते हैं।
(3) अपकविल्यम चूर्ण, पश्मिधु, मधु और मिश्री को लोक में डालकर पितातिसार और रक्तातिसार में प्रयोग करते हैं।
(4) बिल्वपश्वास को सम्पूर्ण शरीर पर लगाने से पसीने से उत्पन्न दुर्गन्ध दूर होती है l

प्रयोज्य अंग - पक्व, अपक्य फल, बिल्वमज्जा, पत्र, मूल, त्वक्

मात्रा - बिल्वमज्जा 3-6 ग्राम स्वरस 10-20 मिली.

विशिष्ट कल्प-बिल्व तैल, गंगाधर चूर्ण, दशमूल तैल, दशमूल घृत l

🙏🙏 जय आयुर्वेद 🙏🙏

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