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सद्वृत्तवर्णन



नमस्कर्ता, बलीनामुपहर्ता, अतिथीनां पूजकः, पितृभ्यः पिण्डदः, काले हितमितमधुरार्थवादी, वश्यात्मा, धर्मात्मा, हेतावीयुः, फले नेयुः, निश्चिन्तः, निर्भीकः, ह्रीमान्, धीमान्, महोत्साहः, दक्षः, क्षमावान्, धार्मिकः, आस्तिकः, विनयबुद्धिविद्याभिजनवयोवृद्धसिद्धाचार्याणामुपासिताः छत्री दण्डी मौली सोपानत्को युगमात्रदृग्विचरेत्; मङ्गलाचारशीलः, कुबेलास्थिकण्टकामेध्यकेशतुषोत्करभस्मकपालस्वान बलिभूमीनां परिहर्ता, प्राक् श्रमाद व्यायामवर्जी च स्यात् सर्वप्राणिषु वन्धुभूतः स्यात्, क्रुद्धानामनुनेता, भीतानामाश्वासयिता दीनानामभ्युपपत्ता, सत्यसंधः, सामप्रधानः, परपरुषवचनसहिष्णुः, अमर्षघ्नः, प्रशमगुणदर्शी, रागद्वेषहेतूनां हन्ता च ॥ १८ ॥


((१) सद्वृत्तवर्णन ( क्या-क्या करना चाहिये)—हे अग्निवेश! उस सद्वृत्त का उपदेश सम्पूर्णरूप में कर रहा है। देवता, गौ, ब्राह्मण, गुरु, वृद्ध, सिद्ध पुरुष तथा आचार्य की पूजा, अग्नि की उपासना (विधिपूर्वक हवन), उत्तम औषधियों का धारण, प्रातः सायं स्नान व संध्या, गुदा आदि मलमार्गों तथा पैरों की सदा सफाई, पक्ष में तीन बार (५-५ दिनों पर) केश-दाढ़ी, रोम और नखों को कटवाना, प्रतिदिन स्वच्छ एवं न फटे हुए वस्त्रों को धारण करना, सदा प्रसन्नमन रहना और सुगंधित इत्र आदि को धारण करना, अपनी वेशभूषा सुन्दर रखना, बालों को कंपी से प्रतिदिन सँवारना, मस्तक, कान, नाक, पैर में प्रतिदिन तेल लगाना और ऋतुचर्या में बताये हुए प्रायोगिक धूम का पान करना चाहिये। यदि अपने पास कोई मिलने के लिए आवे तो उससे पहले ही बोलना चाहिये। प्रसन्नमुख रहना, दूसरे पर आपत्ति आने पर दया करना तथा हवन और यश करना, सामर्थ्य के अनुसार दान देना, चौरास्ते को नमस्कार करना, कौन, कुत्ता आदि को बलि देना, अतिथियों की पूजा करना, पित्तरों को पिण्ड देना, समय पर हितकर, थोड़े और मधुर अर्थ वाले वचनों को बोलना तथा जितेन्द्रिय और धर्मात्मा होना चाहिये। दूसरे को उन्नति के कारणों में ईर्ष्या करनी चाहिये किन्तु उसके फल में ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये। निश्चिन्त, निडर लज्जायुक्त, बुद्धिमान् उत्साही, चतुर, क्षमायुक्त, धार्मिक और आस्तिक होना चाहिये तथा विनय, बुद्धि, विद्या, अभिजन (कुल) और अवस्था में वृद्ध व्यक्ति, सिद्ध एवं आचार्य की सेवा करने वाला होना चाहिये। छत्र और दंड धारण कर सिर पर पगड़ी या मुरैठा बाँधकर जूता पहिन कर, चार हाथ आगे देखते हुए रास्ते में चलना चाहिये। मांगलिक कार्यों में तत्पर, गंदे कपड़े, हड्डी, काँटा, अपवित्र केश, तुष उतकर (कूड़ा-करकट) भस्म, कपाल तथा स्नान करने योग्य और बलि चढ़ाने योग्य स्थानों का त्याग करने वाला होना चाहिये। सभी प्राणियों के साथ भाई के समान व्यवहार करने वाला, क्रोधी मनुष्यों को विनय द्वारा प्रसन्न करने वाला, भय से युक्त व्यक्तियों को आश्वासन देने वाला दीन-दुखी व्यक्तियों का उपकार करने वाला, सत्यप्रतिज्ञ, शान्तिप्रधान, दूसरे के कङ्गोर वचनों को सहने वाला, अमर्ष (असहिष्णुता क्रोध) का नाशक, शान्ति के गुण को देखने वाला और राग-द्वेष उत्पन्न करने वाले कारणों का त्याग करने वाला होना चाहिये ।। १८.२।।


* नानृतं ब्रूयात्, नान्यस्वमाददीत, नान्यस्त्रियमभिलषेन्नान्यश्रियं न वैरं रोचयेत् न कुर्यात् पापं न पापेऽपि पापी स्यात् नान्यदोषान् ब्रूयात्, नान्यरहस्यमागमयेत्, नाधार्मिकैन नरेन्द्रद्विष्टैः सहासीत, नोन्मत्तैर्न पतितेनं हन्तुमिष्टयानान्यात्, नानुसमं कठिनमासनमध्यासील नानास्तीर्णमनुपहितमविशालमसमं वा शयनं प्रपद्येत, न गिरिविषममस्तकेष्वनुचरेत्, न द्रुममारोहेत्, न जलोग्रवेगमवगाहेत, न कुलच्छायामुपासीत, नाग्न्युत्पातमभितश्चरेत्, नाँच्चैर्हसेत्, न शब्दवन्तं मारुतं मुञ्चेत्, नानावृतमुखो जृम्भां, क्षवथुं हास्यं वा प्रवर्तयेत्, न नासिकां कुष्णीयात्-दन्तान् विघट्टयेत्, न नखान् वादयेत्, नास्थीन्यभिहन्यात्, न भूमिं विलिखेत्, न छिन्द्यात्सृणं न लोष्टं मृदनीयात् न विगुणमङ्गैश्चेष्टेत,


'मौनी' ग ३. रामप्रधानः' इति पा. ।


२. 'नक्त युगमात्रक' यो ।


४. यदासनं जानुप्रमाणोत्सेधं न भवति तदजानुसमम्।


५. 'कुलच्छाया सत्कुलोत्पन्नानां स्ववंशोत्पन्नानां वा छायां नोपासीत 'प्रद्धयाम्' इति शेषः, इति गङ्गाधरः 'कूलच्छायाँ'



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