Follow Us

6/recent/ticker-posts

अगर ये दो काम कर लिए तो हमेशा के लिए बीमारियों से छुट्टी (निजात) मिलेगी कभी बीमार नही रहोंगे शुगर, fat एक महिना में खत्म

अगर ये दो काम कर लिए तो हमेशा के लिए बीमारियों से छुट्टी (निजात) मिलेगी कभी बीमार नही रहोंगे शुगर, fat एक महिना में खत्म

अगर ये दो काम कर लिए तो हमेशा के लिए बीमारियों से छुट्टी (निजात) मिलेगी कभी बीमार नही रहोंगे शुगर, fat एक महिना में खत्म


 देखिये दो प्रकार के रोग होते हैं ।

पहला कर्मज रोग 

दूसरा दोषज रोग  


कर्मज रोग वह रोग होते हैं जो जीव के या मनुष्य के पूर्व जन्मों के किये गए कर्मों के आधार पर उत्पन्न होते हैं।  

जैसे अनुवांशिक रोग , या समय समय पर प्रारब्ध जन्य रोग जो आते हैं और चले जाते हैं। 

कर्मज रोग स्थायी और अस्थायी दोनों होते हैं । 


स्थायी कर्मज रोग वह हैं जो जन्म से ही आपके शरीर के साथ लगे हैं । जैसे हृदय में छेद होना, Cancer होना, अपंगता या पेट की कोई समस्या , या नेत्र की , या कान की या होंठ कटे हुए या किसी भी अंग से सम्बंधित समस्या । 


जिसे हम लोग बोलते हैं कि ये मेरे बचपन से ही है। जैसे किसी को gluten से allergy इत्यादि ।

इस रोग को विश्व के बड़े से बड़े doctor भी नहीं ठीक कर पाता और व्यक्ति को आजीवन उससे होने वाले दुख जो कम करने के लिए दवाईयों पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर वह मृत्युकारक बनकर ही अंत करता है। 


अस्थायी कर्मज रोग वह हैं जो समय समय पर अचानक से आये और बड़े से बड़ा doctor भी ठीक न कर पाए लेकिन फिर अचानक से वह अपने आप स्वयमेव खत्म हो जाये । 


कभी कभी आपने देखा होगा कि एक छोटा सा रोग भी महान से महान doctor ठीक नहीं कर पाता उसी दवाई से जिस दवाई से उसने अनगिनत रोगियों को ठीक किया होता है। तो यह स्थायी कर्मज रोग होते हैं। 

यह कब तक प्रारब्ध भोग रहेगा तब तक आपके शरीर में रहकर कष्ट देंगे और जब प्रारब्ध भोग खत्म हो जाएगा , तो स्वयमेव चले जायेंगे या कुछ ऐसी विडंबना बनेगी कि आप किसी साधारण से साधारण doctor के पास जाकर ठीक हो जाएगा या कोई भी कुछ साधारण सा उपचार बता देगा , उससे ठीक हो जाएगा । 

यह अपने समय पर ही जाते हैं , इससे पहले कोई असंख्य उपाय कर ले , यह नहीं जाते । 


अब जैसे अष्टावक्र थे , वह आठ जगह से टेढ़े थे , वह कोई पिज़्ज़ा बर्गर या असंयमित भोजन नहीं करते थे फिर भी । तो यह कर्मज था । पांडु को पांडुरोग 


दोषज रोग वह होते हैं जो मनुष्य के स्वयं के असंयमित खान पान , जीवन शैली , आचार विचार , नियम संयम , रहन सहन , ऋतु सम्बंधित आचार या भोजन शैली न अपनाने के कारण या वर्तमान समय के भक्ष्य अभक्ष्य की भंगता के कारण होते हैं ।


वर्तमान समय में मनुष्य के अधिकतर रोग दोषज रोग हैं। दोषज रोग कर्मज रोग से बहुत ज्यादा हैं।  

यह क्यों ??? 


क्योंकि भक्ष्य अभक्ष्य का ध्यान न रखना , नियम संयम से न रहना , जब चाहे तब मुँह में ठूस लेना , शाम सुबह दोपहर रात इत्यादि का ध्यान न रखना , कब क्या खाना है , कितना खाना है , क्यों खाना है किसी बात का ध्यान नहीं रखना । 


तो आज 60% से अधिक रोग एकमात्र दोषज रोग हैं । 


शरीर पाँच तत्वों से निर्मित होता है। 

जल, अग्नि , आकाश , पृथ्वी और वायु ।


इन्हीं के द्वारा प्रत्येक शरीर के प्राकृतिक उद्भव या चेतना को प्रभावित किया जाता है।  


इन्हीं को हम कहते हैं :- 


1. वात ( वायु और आकाश ) 

2. पित्त ( अग्नि और जल ) 

3. कफ ( पृथ्वी और जल ) 


यह तीनों दो दो तत्वों के युग्म पर आधारित होते हैं । 


इन्हीं दो तत्वों के बिगड़ने पर या असंतुलित होने पर शरीर में दोष आता है । 


इसीलिए इन्हें दोष कहते हैं । दोष का मतलब जब इन्हीं "दो" युगमकों में असंतुलन पैदा होता है तो वह रोग या शारीरिक दोष का कारण बनता है।  

मनुष्य का प्रत्येक रोग इन्हीं वात , पित्त और कफ पर आधारित होता है।  


चाहे कर्मज रोग हों या दोषज रोग हों , सब इन्हीं दोष से सम्बंधित होते हैं।  


अभी ऊपर मैंने बताया न कि दोषज रोग एकमात्र मनुष्य के असंयमित खान पान , रहन सहन के कारण होता है।  

जिसके कारण इन दो युग्मों के बीच असंतुलन पैदा होता है इसलिए इन्हें "दो"षज रोग बोला जाता है।  


कर्मज भी भी इन्हीं वात, पित्त , कफ की असंतुलन से ही होता है लेकिन उसका कारण प्रत्यक्ष रूप से आप नहीं बल्कि परोक्ष रूप से आप होते हैं ( पूर्व जन्मों के कर्मानुसार ) 


अब यह समझिए कि प्रत्येक जीव या इस मृत्युलोक में प्रत्येक शरीर किसी न किसी प्राकृतिक दोष की अधिकता से प्रभावित रहता है।  


मतलब कोई वात प्रधान , कोई पित्त प्रधान ,कोई कफ प्रधान । 

प्रत्येक योनि वाला शरीर किसी न किसी दोष की प्रधानता से युक्त होता है। 


इसीलिए किसी को कम गर्मी ,किसी को कम ठंडी , किसी को पानी ,किसी को आकाश ज्यादा या कम चाहिए होता है।  


अस्तु , हम अभी मात्र अपने मानव शरीर के विषय पर चर्चा करेंगे । हम विषयवस्तु से नहीं भटकेंगे अन्यथा पुस्तक लिख दी जाएगी।  


तो प्रत्येक मानव शरीर भी किसी न प्राकृतिक दोष की प्रधानता से युक्त होता है। और प्रत्येक शरीर अलग अलग दोष की प्रधानता से युक्त होता है।  


इसीलिए प्रत्येक शरीर की immunity , रोग , पाचन शक्ति , शारीरिक शक्ति , रंग , भेद, किसी को ज्यादा प्यास लगती है , कोई दिन भर पानी नहीं पीता , किसी को अधिक गर्मी लगती है तो किसी को अधिक ठंडी, इत्यादि तो सबमें विभिन्नता होती है । 


हो सकता है आपका शरीर वात प्रधान हो , लेकिन आपके बेटे का शरीर पित्त प्रधान हो और आपकी पत्नी का शरीर कफ प्रधान हो।  


अब दूसरी बात बताता हूँ । 


प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्राकृतिक दोष की अधिकता के अधीन तो होता ही है ,लेकिन साथ ही साथ उसमें भी जीवन के प्रत्येक phase में हर तत्व की अधिकता आती रहती है।  


जैसे शिशु के जन्म से लेकर उसके तरुणावस्था या किशोरावस्था ( teenage ) तक , मनुष्य शरीर में "कफ" की प्रधानता होती है । 


फिर तरुणावस्था से ( Young age ) लेकर 50 वर्ष तक कि अवस्था तक या प्रौढ़ावस्था तक मनुष्य शरीर में "पित्त" की प्रधानता रहती है।  


फिर वृद्धावस्था से लेकर मृत्युपर्यंत तक "वात" तत्व की प्रधानता रहती है।  


जिस जिस अवस्था में इन तत्वों की प्रधानता रहती है उन्हीं से सम्बंधित रोग उस अवस्था में शरीर पर आक्रमण करते हैं या मनुष्य उन्हीं रोगों से दुखी रहता है।  


अब एक और अंतरंग बात सुनिए । इनकी प्रधानता मात्र यहीं तक नहीं रहती बल्कि प्रत्येक ऋतु में यह बारी बारी से अपनी प्रधानता जीवों के शरीर पर दिखाते हैं। 


अब फिर सुनिए , और अंतरंग बात । इनकी प्रधानता मात्र ऋतु तक पर ही नहीं सीमित रहती बल्कि यह प्रत्येक दिन में सुबह , दोपहर और शाम इन तीनों समय अलग अलग तत्वों की प्रधानता में शरीर पर अपना कार्य करती हैं।  


अब फिर सुनिए , और अंतरंग बात । इनकी प्रधानता मात्र दिन के सुबह दोपहर शाम तक पर तक ही नहीं सीमित रहती बल्कि दिन के प्रत्येक नक्षत्र , मुहूर्त, ग्रहण , पूर्णिमा इत्यादि पर अलग अलग तत्वों की प्रधानता शरीर पर अपना कार्य करती है।  


और भी इसी तरह अंतरंगता बढ़ती जाएगी ( 4 step और हैं ) लेकिन अगर यहाँ विस्तार से समझाने लगा तो मूल बात पर नहीं पहुँच पायेंगे और आप पढ़ते पढ़ते ऊब जाएंगे।  


तो इन सब की वैज्ञानिकता या वात , पित्त , कफ का विज्ञान और इनकी पूरी विशेषता हमारे सनातन धर्म को पहले से पता था इसलिए वह इतना विज्ञान समझाने की जगह कुछ सूत्र बना दिये ताकि मनुष्य इनका लाभ लेकर अपने शरीर के इन दोषों को संतुलित रख कर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर सके।  


बस इन्हीं स्वास्थ्य लाभ को करवाने के लिए तरह तरह के नियम बनाये गए । यह मत खाओ ,यह खाओ ,यह इस ऋतु में सेवन करो , यह इस ऋतु में मत सेवन करो , इस दिन यह खाओ ,इस दिन यह न खाओ , पूर्णिमा के दिन यह खाओ ,यह न खाओ , अमावस्या के दिन यह खाओ ,यह न खाओ , दिन , रात , सुबह , वर्षा , घाम ,शीत के समय यह खाओ यह न खाओ।  

इस दिन व्रत रखो , एकादशी के दिन चावल न खाओ , इस दिन कूटू खाओ , इस दिन तिल खाओ , इस दिन फलाहार रहो ,इस दिन जलाहार रहो ,इस दिन निर्जल उपवास करो , इस दिन पूरे दिन कुछ न खाकर रात में अन्न खाओ इत्यादि। 


हर ऋतु परिवर्तन पर व्रत या उपवास का विधान बनाया , उत्सव बनाये गए । गर्मी आते ही वासंतिक नवरात्र , ठंडी आते ही शारदीय नवरात्र । दीपावली के अमावस्या पर सूरण या जिमीकंद की सब्जी खाना से लेकर तमाम तरह की चीज़ें बनाई।   


अन्न किस अन्न के साथ या चीज़ के साथ खाना है ,यह भी हमारे वैज्ञानिकों ने बताया । आलू के साथ जीरा या मेथी का तड़का , करेले के साथ इस मसाले का प्रयोग , इसके लिए हींग का तड़का या इस मसाले का प्रयोग ,इसमें कोई मसाला नहीं इत्यादि । 


देखिये मनुष्य को छोड़कर , किसी भी जीव को दोषज रोग नहीं होते । 

उनको कोई भी रोग होगा ,वह एकमात्र कर्मज रोग होंगे। 

 क्योंकि मनुष्य शरीर को छोड़कर सभी योनियाँ भोग योनि हैं जिनमें उनके पूर्व जन्मों के कर्मों का फल भुगवाया जाता है । एकमात्र मनुष्य योनि ही ऐसा है जो कर्म प्रधान के साथ साथ भोग योनि है। 


इसीलिए इन जंगली जानवरों से लेकर किसी कीड़े मकोड़े या वायरस तक को किसी doctor की आवश्यकता नहीं पड़ती । 


इनको कब क्या खाना है , कितना खाना है या कोई रोग उत्पन्न हो जाने पर कौन सी औषधि , या पत्ते , या फल ,या कीड़ा , या जड़ , या मिट्टी खानी है , यह सब प्राकृतिक तौर पर इनको स्वयमेव प्रेरणा होती है। 


इनको अपने बच्चों को जन्म तक देने के लिए किसी दाई , डॉक्टर , दवाई , हॉस्पिटल की आवश्यकता नही पड़ती और न ही baby Vaccination प्रोग्राम चलता है।  

गर्भावस्था के दौरान इनको bed rest भी नहीं चाहिए और न ही गर्भकाल के दौरान या गर्भकाल के बाद किसी पिसुवा ( बादाम , गोंद , सोंठ इत्यादि ) की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।  

जानते हैं क्यों ?? क्योंकि वह प्रकृति के आधारित नियम पर चलते हैं । 


लेकिन हम लोग अपने मन मर्जी अनुसार चलते हैं। प्रकृति के अनुसार बिल्कुल नहीं चलते । यहाँ तक कि हमारे मनीषियों ने शास्त्र लिख दिए , नियम संयम का विधान तक बना दिया लेकिन तब भी नहीं मानते बल्कि उनका मजाक उड़ाकर , उस पर प्रश्नचिन्ह लगाकर उसको जलाते हैं , थूकते हैं । 


तो क्या होगा हमारा ??? 


हम इसी तरह कर्मज और दोषज रोगों से जीवन भर पीड़ित रहेंगे और दुखी रहेंगे। हमारा समय ,धन , जीवन सब Hospitals और Doctors के हवाले रहेगा । 


इसलिए नियम संयम , भक्ष्य अभक्ष्य का विचार कर अपने जीवन को सुखमय बनाये । 


नहीं तो फिर भोगिये ! 


काहु न कोउ सुख दुख कर दाता ।

निज कृत कर्म भोग सब भ्राता ।। 


वात , पित्त , कफ दोष क्या होते हैं , या कौन कौन से रोग होते हैं , 

अगर ये दो काम कर लिए तो हमेशा के लिए बीमारियों से छुट्टी (निजात) मिलेगी कभी बीमार नही रहोंगे शुगर, fat एक महिना में खत्म

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ