त्रय-उपस्तम्भ किसको कहते है आइये जानते हैं
"त्रय उपस्तम्भा इति-आहारः स्वप्नो ब्रह्मचर्यमिति ।" (च सू. ११/३५) "त्रितयं चेदमुपष्टम्भनमाहारः स्वप्नोऽब्रह्मचर्ये च ।।" (अ.सं.सू. ९/३६)
आहार, स्वप्न (निद्रा) एवं ब्रहाचर्य-शरीर के लिए उपस्तम्भ है, आ० वाग्भट्ट ने इन तीनों का युक्तिपूर्वक पालन वर्य के स्थान पर अब्रह्मचर्य का उल्लेख किया है। प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए क्योंकि इसके पालन से शरीर में स्थिरता आती है और बल, वर्ण एवं आयु में वृद्धि प्राप्त होती है।
जीवित प्राणी को मुख्य रूप से आत्मा, मन, शरीर के संयोग रूप में जाना जाता है, अर्थात् ये जीवन के आधार हैं इसी कारण इन्हें त्रिदण्ड की संज्ञा दी गयी है। जीनन के आधार इन त्रिदण्ड को सहायता प्रदान करता है त्रय उपस्तम्भ। आहार, निद्रा एवं ब्रह्मवयं के युक्ति पूर्वक सेवन से शरीर एवं मन का स्वास्थ सम्भव है और स्वस्थ शरीर च में ही स्वस्थ गन निवास करता है, शरीर के जीर्ण, रुग्ण होने पर आत्मा शरीर को छोड़ देती है। अतः जीवन के आधार (त्रिदण्ड) का आधार त्रय उपस्तम्भ है। आहार, निद्रा एवं ब्रह्मचर्य का अगर युक्ति पूर्वक उपयोग किया जाय तो शरीर उपस्तब्ध (स्थिर) बना रहता है अर्थात् स्वस्थ बना रहता है तथा आयु की वृद्धि होती है।"
आहार एवं इससे सम्बन्धित विषयों का प्रतिपादन विस्तृत रूप से अगले अध्यायों में क्रिया जायेगा यहाँ पर निद्रा एवं ब्रह्मचर्य विषय का वर्णन किया जा रहा है।
निद्रा
"यदा तु मनसि क्लान्ते कर्मात्मानः क्लमान्विताः ।
विषयेभ्यो निवर्तन्ते तदा स्वपिति मानवः ।।" (च.सू. २१/३५)
जब कार्य करते-करते मन थक जाता है एवं इन्द्रियाँ भी थक कर अपने-अपने
विश्यों से निवृत्त हो जाती हैं तब मनुष्य को निद्रा उत्पन्न होती है।
"श्लेष्मावृतेषु स्त्रोतः सु श्रमादुपरतेषु च ।
इन्द्रियेषु स्वकर्मभ्यो निद्राऽऽविशति देहिनम् ।।" (अ.सं.सू. ९/३९)
आहार पाचन से उत्पन्न आहार रस की श्लेष्मा द्वारा स्रोतों के आवृत होने पर तथा इन्द्रियों द्वारा अपने विषयों का ग्रहण करते-करते जो श्रम उत्पन्न होता है उसके कारण
१. च.सू. ११/३५, सु.शा. ४/३३, ११.सं.सू. ९/३६
इन्द्रियाँ अपने विषयों से निवृत्त हो जाती हैं। इसके परिणाम स्वरूप मनुष्यों में निद्रा उत्पन्न होती है।
स्वप्न-
जब श्रम के कारण सभी इन्द्रियाँ अपने विषयों से निवृत्त हो जाती है परन्तु मन विषयों से निवृत्त नहीं होता है तब विविध प्रकार के स्वप्न दिखलायी पड़ते हैं।
निद्रा इस शरीर को स्वाभाविक प्रक्रिया है। प्रसन्न चित्त के लिए सम्यक निद्रा आवश्यक होती है, शरीर एवं मन को स्वस्थ रखने में निद्रा सहायक होती है। निद्रा अगर अपने नियत समय पर एवं उचित रूप में आती रहती है तो शरीर स्थिरता को प्राप्त होता रहता है एवं शरीर-चित्त दोनों कार्यक्षम बने रहते हैं। स्वाभाविक रूप से आने वाली निद्रा ही उपस्तम्भ में आती है। यही निद्रा रात्रि स्वभाव प्रभवा, वैष्णवी एवं काल स्वभाव प्रभवा संज्ञा आदि से जानी जाती है।
निद्रा के प्रकार'-
आ० सुश्रुत ने निद्रा के तीन भेद बतायें हैं-
(i) वैष्णवी (ii) वैकारिकी एवं (iii) तामसी निद्रा।
आ० चरक ने निद्रा के छः प्रकार बताये है-
(i) तमोभवा
(ii) आगन्तुकी
(iii) श्लेष्मसमुद्भवा
(iv) व्याघ्यनुवर्तिनी
(v) मनः शरीरश्रम सम्भवा
(vi) रात्रि स्वभाव प्रभवा
आ० वागभट्ट ने निद्रा के सात प्रकार बताये हैं-
(i) कालस्वभाव प्रभाव से (स्वाभाविक निद्रा)
(
ii) आमयज (व्याधि के खेद से)
(iii) चित्त के खेद से
(iv) देह के खेद से
(v) श्लेष्मप्रभवा
(
vi) आगन्तुक (किसी कारण के अरिष्ट रूप में)
(vii) तमोभवा निद्रा
वैष्णवी, रात्रि स्वभाव प्रभवा एवं काल स्वभाव प्रभवा निद्रा स्वाभाविक निद्रा है, यही भूतधात्री, प्राणधारक निद्रा है। शेष सभी निद्रायें मनुष्य के स्वास्थ के लिए अहितकर होती है तथा रोगों का कारण होती हैं।
१. सु.शा. ४/३३, च.सू. २२/५८,५९, अ.सं.सू. ९/६८
निद्राकाल एवं प्रमाण- 'स्वाभाविक निद्रा का समय रात्रिवेला है और यही हमारे लिए सात्त्य है परन्तु ग्रीष्म
ऋतु में दिवा स्वाप भी निद्रा काल है।
मनुष्यों में निद्रा का प्रमाण ६ घण्टे से ९ घण्टे तक माना जाता है, यह समय भिन्न- भिन्न व्यक्तियों में भिन्न हो सकता है।
• नवजात में-१८ से २० घण्टे निद्रा प्रमाण • बच्चों में-१० से १२ घण्टे निद्रा प्रमाण
• वयस्कों में-६ से ९ घण्टे निद्रा प्रमाण
• वृद्धों में-५ से ७ घण्टे निद्रा प्रमाण
स्त्रियों में निद्रा का प्रमाण पुरुषों से ४५ मिनट से १ घण्टे तक ज्यादा होता है।
स्वस्थ एवं आतुर में भी निद्रा का प्रमाण अलग-अलग होता है। सामान्यतः वह सभी व्याधियाँ जो पीड़ा करने वाली एवं वातप्रधान होती है उनमें निद्रा का प्रमाण कम होता है। आलस्य लक्षण युक्त एवं कफप्रधान व्याधियों में निद्रा का प्रमाण बढ़ जाता है।
निद्रा से लाभ'-
उचित समय एवं उचित मात्रा में स्वाभाविक रूप से आने वाली निद्रा से शरीर एवं मन सुखी (स्वस्थ) रहते हैं, शरीर का पोषण, बल की वृद्धि, शुक्र की वृद्धि, ज्ञानेन्द्रियों को उचित रूप में विषयो में प्रवृत्ति एवं आयु नियत रूप में यथाकाल तक बनी रहती है तथा शरीर की वृषता बनी रहती है।
अनिद्रा से हानि-
निद्रा का सम्यक योग न होने से- कृशता, बल का क्षय, क्लीवता एवं इन्द्रियों का अपने विषयो में उचित रूप से प्रवृत्त न होना आदि निद्रा के न आने से या उचित निद्रा न हो पाने से उत्पन्न होते हैं।
यदि निद्रा का सेवन अकाल में, असमय में किया जाय तो या उचित काल से ज्यादा निद्रा का सेवन किया जाय तो या निद्रा का सेवन ही न किया जाय तो मनुष्य के सुख, आरोग्य और आयु को दूसरी काल रात्रि (मृत्यु कालीन) की तरह निद्रा नष्ट कर देती है। अर्थात् निद्रा का मिथ्या प्रयोग, अतिप्रयोग एवं अयोग जीवन के लिए मृत्युकालीन रात्रि के समान अनिष्टकारी होती है। इसी प्रसंग में आ० सुश्रुत का यह मन्तव्य विशेष अर्थ रखता है कि-
१. च.सू. २१/३६, अ.सं.सू. ९/४२ २. अ.सं.सू. ९/४१, च.सू. २१/३६
४ स्व. वि.
"तस्मान्न जागृयाद्रात्रौ दिवास्वप्नं च वर्जयेत् । ज्ञात्वा दोषकरावेतौ बुधः स्वप्नं मितं चरेत् ।।" अरोगः सुमना होवं बलवर्णान्वितो वृषः । नातिस्थूलकृशः श्रीमान् नरो जीवेत् समाः शतम् ।। (सु.शा. ४/३८-३९)
रात्रि जागरण एवं दिवास्वप्न दोष प्रकोपक होते हैं (रात्रि जागरण से वात का प्रकोप होता है तना दिवाशयन से कफ दोष का प्रकोप होता है) अतः इनका निषेध करना चाहिए और समय पर एवं उचित काल तक निद्रा का सेवन करना चाहिए। इससे मनुष्य निरोग, प्रसन्न, बल-वर्ण युक्त, वृषता, ना स्थूलता ना कृशता एवं श्री युक्त होकर सौ वर्ष की आयु पूर्ण करता है। अतः शरीर धारण के लिए जिस प्रकार से नियम पूर्वक एवं उचित मात्रा में सेवन किया गया आहार लाभकर होता है और मनुष्य का स्वास्थ बनाये रखता है, उसी प्रकार जब नियमपूर्वक एवं उचित काल तक निद्रा का सेवन किया जाय तो वह (निद्रा) शरीर के लिए सुखकर, आरोग्यकर होती है।
ग्रीष्म ऋतु को छोड़कर अन्य ऋतुओं में दिन में शयन करने से कफ एवं पित्त का प्रकोप होता है इस कारण मनुष्य को दिन में शयन नहीं करना चाहिए। ग्रीष्म ऋतु में आदान काल होने से शरीर में रुक्षता होती है, वात के कुपित होने की सम्भावना रहती एवं रात्रि अत्यन्त छोटी होती है जिससे निद्रा पूरी नहीं हो पाती है अतः ग्रीष्म ऋतु में दिन में शयन करना लाभकर होता है।'
निद्रानाश के कारण-
भय, चिन्ता, क्रोध, धूमपान, व्यायाम, रक्तमोक्षण (अधिक रक्तमोक्षण), उपवास, उपयुक्त शय्या का न होना, सत्व गुण की प्रधानता, तमोगुण का क्षय, कार्य विशेष में रत रहना, उपयुक्त काल का न होना, रोग ग्रस्त होना, प्रकृति (वातज एवं पित्तज प्रकृति मनुष्यों को कम निद्रा आती है) तथा विकृत रूप में पित्त एवं वायु के प्रकोप के कारण निद्रा नहीं आती है। धातु क्षय, अभिघात, मनस्ताप आदि के कारण भी निद्रानाश होती है। अतिनिद्रा की चिकित्सा में इन्हीं उपायों का प्रयोग किया जाता है।
अतिनिद्रा से हानि-
अतिनिद्रा से आहार पाचन काल में कफोत्पत्ति की वृद्धि होने से, तदुपरान्त स्रोतोवरोध होने से शरीर में भारीपन एवं आलस्य उत्पन्न होता है। अतिनिद्रा सेवन से
१. च.सू. २१/४३-४४
२. च.सू. २१/५६,५७
३. च.सू. २१/५१,५६, अ.सं.सू. ९/५२-५४
२५ स्थूलता पैदा होती है, प्रमेह, कुष्ठ, शोफ, पीनस, ज्वर, गलरोग, अरुचि एवं अन्य कफजन्य विकार उत्पन्न होने की सम्भावना बनी रहती है। अतिनिद्रा से उत्पत्र व अन्य (कफवृद्धि) पुन: निद्रा का कारण बना रहता है इसी कारण इसकी चिकित्सा में आचायों ने कफनाशक एवं स्रोतोशोधक शोधन कर्मों का प्रयोग बताया है।
निद्रा लाने वाले उपाय-
अभ्यंग, उत्सादन (उबटन आदि का प्रयोग) स्नान, ग्राम्य-आनूप एवं जलीय पशु पक्षियों का मांस रस, दधि के साथ चावल का प्रयोग, दुग्ध (माहिष दुग्ध), घृत, मदिरा (अल्प मात्रा) आदि का प्रयोग, मन को प्रसन्न करने वाले भाव, मन के अनुकूल गन्ध एवं शब्द, शरीर को दबवाना, नेत्र तर्पण, सिर एवं मुख पर शीतल द्रव्यों का लेप, मनोनुकूल शयन कक्ष एवं बिस्तर, नियत समय पर निद्रा आदि निद्रा लाने के उपाय हैं और अतिनिद्रा के लिए यही कारण भी होते हैं।
जो ब्रह्मचर्य में रत है, जिसका चित्त ग्राम्यसुख (मैथुनादि) से दूर रहता है और सन्तोष से पूर्ण रहता है ऐसे व्यक्ति में निद्रा अपने समय पर आती है।
तन्द्रा-
जब अल्प कफ वायु द्वारा प्रेरित होकर संज्ञावाही धमनियों (स्रोतस) को अवरुद्ध कर संज्ञा का नाश कर देता है। तब दारुण (भीषण) मोह (ज्ञाननाश) करने वाली तन्द्रा उत्पन्न होती है। तन्द्रा में जब थोड़ी निद्रा आती है तो कफोत्क्लेश होता है परन्तु यह तन्द्रा अकाल शयन या असम्यक शयन में उत्पन्न होती है अतः यह उत्क्लेशित कफांश; कुपित वायु से स्रोतसों (मनोवाही) को प्रवृत्त होती है और अवरोध उत्पन्न कर देती है, इस कारण से जैसे निद्रा में विषयो का ज्ञान नहीं होता उसी प्रकार मोह जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। यह निद्रा से भिन्न अवस्था होती है अतः वैकारिक मानी जाती है। तन्द्रा में नेत्र की पलकें कुछ खुली और कुछ बन्द रहती है, नेत्रतारक (Eye ball) टेढ़ा-मेढ़ा रहता है, नेत्रों से अश्रु स्राव होता है, नेत्र पक्ष्म चंचल रहते हैं। पैसा माना जाता है कि साढ़े तीन दिन तक का तन्द्रा रोग साध्य होता है इसके बाद का तन्द्रा रोग असाध्य सा हो जाता है।
तन्द्रा (दिन में झपकी आते रहना) से बचने के लिए, ठीक समय पर निद्रा का सेवन सात्यानुसार करना चाहिए। रात्रि में असात्म्य (प्रतिकूल भावों) कारण से जितनी देर नींद न आई हो तो दिन में बिना आहार सेवन किए (कफोत्क्लेश न हो) उतने समय के आधा समय तक शयन कर लेना चाहिए।'
१. च.सू. २१/५२-५४, अ.सं.सू. ९/६६
२. अ.सं.सू. ९/५७-५९
३.
अ.सं.सू. ९/६०
ब्रह्मचर्य
आचार्य वाग्भट्ट ने त्रय उपस्तम्भ में ब्रह्मचर्य की गणना ना कर अब्रह्मचर्य का उल्लेख किया है वास्तव में इन दोनों शब्दों का इस प्रसंग में कोई विरोध नहीं है।
ब्रह्मचर्य का अर्थ होता है अपनी इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना। सभी कर्मेन्द्रियों में उपस्थ नामक कर्मेन्द्रिय अपने विषयों में जल्दी प्रवृत्त हो जाती है अतः इस पर नियन्त्रण कठिन होता है। जो व्यक्ति इस कर्मेन्द्रिय पर नियन्त्रण प्राप्त कर लेता है वह बाकी कर्मेन्द्रियों पर आसानी से विजय प्राप्त कर सकता है। इसलिए लिगेंन्द्रिय से सभी इन्द्रियों का भाव लेना चाहिए और जो व्यक्ति इनको नियन्त्रण में रखता है वह ब्रह्मचारी होता है। स्व पत्नी के साथ रात्रि में यथाविधि पुत्रेच्छा से मैथुन करना चाहिए यह सृष्टि परम्परा के चलते रहने में सहायक होता है। इसे ही आ० वाग्भट्ट ने अब्रह्मचर्य कहा है।
काम का अर्थ होता है इच्छा या कामना एवं इन्द्रिय मात्र की अपने-अपने विषय में प्रवृत्ति ही काम है। परन्तु काम शब्द लिगेंद्रिय के विषय के लिए सामान्य रूप में प्रयोग होता है। काम का उद्देश्य सुख एवं सन्तानोत्पत्ति माना गया है। मन की प्रवृत्ति इस विषय (काम) में उत्कृष्ट रूप से होती है अत: इसे (काम को) मनोज भी कहा जाता है। मन की इस उत्कृष्ट प्रवृत्ति का सर्वदा एवं सभी भावों में निषेध करना ही ब्रह्मचर्य है अर्थात् सामान्य भाषा में मैथुन का सर्वथा निषेध ब्रह्मचर्य एवं स्वपत्लि के साथ विधिनुसार मैथुन ही अब्रह्मचर्य है।
ब्रह्मचर्य के पालन के लिए निम्नलिखित आठ प्रकार के मैथुन से दूर रहना चाहिए-
(१) स्मरण - मैथुन के निमित्त स्त्री या पुरुष का स्मरण।
(२) कीर्तन - मैथुन सम्बन्धित चर्चा।
(३) केलि - मैथुन सम्बन्धि किलोल करना।
(४) प्रेक्षण-कुदृष्टि रखना।
(५) गुह्यभाषण-एकान्त में बातें करना
(६) संकल्प-मैथुन की प्रबल इच्छा रखना।
(७) अध्यवसाय - सम्भोग प्राप्ति के लिए प्रयत्न।
(८) क्रिया - सम्भोग की क्रिया।
त्रय उपस्तम्भ में ब्रह्मचर्य के वर्णन का उद्देश्य यह है कि ब्रह्मचर्य का पालन करने
१. सु.शा. १०/५६ डल्हण टीका
२. याश. स्मृ.
२७ से शरीर के उत्कृष्ट तेज एवं आहार के रस आदि के सारभूत शुक्र की रक्षा होती है।' जिस कारण से शरीर स्वस्थ बना रहता है, धातुओं का क्षय नहीं होता है, शरीर एवं मुख का तेज बना रहता है। राजयक्ष्मा रोग जो रोगराट् है, का मुख्य निदान है शुक्र का प्रतिलोम क्षय। अतः दृढ़ता पूर्वक शुक्र की रक्षा के लिए ब्रहाचर्य का पालन करना चाहिए। इस प्रकार शरीर में स्थिरता बनी रहती है और ब्रह्मचर्य शरीर के लिए एक उपस्तभ की तरह होता है। सहायक
आयुर्वेद शास्त्र में अब्रह्मचर्य (स्व पत्नि या गम्य स्त्री प्रसंग) को स्वस्थंवृत्त का हिस्सा माना जाता है। गृहस्थ आश्रम में विवाह तथा पूर्व में शुक्रपरिरक्षण एवं गृहस्थ आश्रम में भी संयमित व्यवाय यह विषय स्वस्थवृत्त से सम्बन्धित है। सभी ऋतुओं में व्यक्ति तीन-तीन दिन पर मैथुन कर्म में प्रवृत्त हो सकता है परन्तु ग्रीष्म ऋतु में पक्ष में एक बार मैथुन करने की स्वतन्त्रता शास्त्र देते हैं।
अतिव्यवाय जन्य हानी-
शुक्र को सभी धातुओं का परम्भाग माना जाता है तथा यह शरीर में साहस, वीरता, उत्साह आदि का कारण होता है। अतः शुक्र की रक्षा करनी चाहिए या अति ब्यवायं से बचना चाहिए। अतिव्यवाय में रत रहने से 'शूल, कास, ज्वर, श्वास रोग, कार्य्य, पाण्डु, क्षव (सभी धातुओं का), आक्षेपक आदि रोग उत्पन्न होने की सम्भावना रहती है। अतिप्रसंग से शुक्रक्षय के कारण शोष (राजयक्ष्मा) रोग उत्पन्न हो जाता हैं।
स्त्री प्रसंग में संयम बरतने से व्यक्ति दीर्घजीवी, जरा का देर से आना, शरीर, वर्ण और बल से युक्त, पुष्ट-दृढ़ मासपेशियों वाला बनता है।
गर्भाधान काल-
आयुर्वेद में गर्भाधान काल का जो वर्णन किया गया है वह स्वस्थवृत्त की दृष्टि से
अत्यन्त महत्वपूर्ण है या यह कहें कि स्वस्थवृत्त के दृष्टिकोण से ही उसका वर्णन किया गया है। क्योंकि स्त्री की स्वच्छता, मनोदशा एवं चर्या पर इस काल में विशेष जोर दिया गया है।
योग्य वय के पति-पत्नि गर्भाधान के लिए ऋतु काल में प्रयास करे। आर्तव दर्शन के बाद ऋतुकाल १२ दिन का माना जाता है, आधुनिक शास्त्रों में गर्भाधान का उपयुक्त समय ऋतु चक्र में १२ से १६ दिन का माना जाता है। पुराने रज के बीत जाने पर, नये
१. अ.सं.सू. ९/८४
३. सु.चि. २४/१११, १२६
५. अ.सं.शा. १/४०, सु.शा. ३/६
२. सु.चि. २४/११३
४. सु.चि. २४/११३
आहार एवं पोषण
आहार या भोजन वह पदार्थ होतें है जिनका प्रयोग जन्तु या वनस्पतियाँ अपनी वृद्धि एवं जीवन को बनाये रखने के लिये करते हैं। प्राणियों के लिये आहार वह द्रव्य होते हैं जो मुख मार्ग से ग्रहण किये जाते हैं, शरीर के लिये आवश्यक ऊर्जा उत्पादन, धातुओं को क्षतिपूर्ति करते हैं, शरीर की वृद्धि करते हैं, जीवनीय शक्ति बनाये रखते हैं एवं जीवन की विभिन्न प्रक्रियाओं में सहायक होते हैं। यह आहार द्रव्य ठोस एवं द्रव रूप में होते हैं। आ० चरक ने द्रव्य प्रकरण में बताया है कि "सर्व द्रव्यं पाञ्चभौतिकमस्मिन्नर्थे। सभी द्रव्य (कार्य द्रव्य) जो संसार में उपस्थित है पाँच भौतिक होते हैं। शरीर भी पंच भौतिक होता है, आहार भी पाँच भौतिक होता है और शरीर के भिन्न-भिन्न अवयव अलग-अलग महाभूतों की प्रधानता से उत्पन्न होते हैं। संसार में उपस्थित सभी द्रव्य पाँच भौतिक है अतः सभी द्रव्य आहार माने जा सकते है। परन्तु कुछ द्रव्य शरीर व मन के लिये हितकारक होंगे और कुछ द्रव्य शरीर का अहित करने वाले होंगे। इसलिए पाँच भौतिक होते हुये भी आहार वही है जो शरीर का कल्याण कारण हो।
आहार के विभिन्न भेद-
(i) उत्पत्ति के आधार पर
(a) जांगम आहार (Animal origin)
(b) स्थावर आहार (Plants origin)
(ii) प्रभाव के आधार पर-
(a) हितकर आहार (Benificial Diet)
(b) अहितकर आहार (Harmful Diet)
(iii) उपभोग के आधार पर-
(a) पान (Able to drink)
(b) अशन (Need of normal mastication)
(c) मक्ष्य (Need of strong mastication)
(d) लेख (Able to lick)
१. च.सू. २५/३६

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